कहते हैं'निरइच्छा वाले को भगवान भी नहीं जीत सकता।'मनुष्य और निरइच्छा'क्या सम्भव है?ईश्वर इच्छा पर चलने से मनुष्य सुखी हो सकता है।अपने को भगवान के भरोसे छोड्र दो,समय जो तुमसे करा ले जाए,तुम सिर्फ एक साधन हो मात्र ।बहुत सुखी रहोगे।जिसने जन्म दिया है वही पालेगा भी,चलाएगा भी तुम सिर्फ दर्शक बने रहो कि वह तुम से क्या करवा रहा है।बडा मजा आएगा।यह इतना आसान नहीं है,इसके लिए अपने पर संयम रखना होगा।
Tuesday, January 5, 2010
Friday, October 2, 2009
जरुरत मित्र की या मित्र की टिप्पणी की?
विषय तो सोचने को मजबूर कर रहा है,परिणाम यह निकला कि दौनों की आवश्यकता है।दौनों के बिना हम अधूरे हैं।सच्चा मित्र होता हीवही है जो अपने मित्र की अच्छाई की प्रशषा करे और उसकी बुराई पर पर्दा करते हुए उसे टिप्पणी्
द्वारा,सुझाव द्वारा प्रेम पूर्वक अपना समझकर समझाए।ऐसे मित्र मिलना इतना आसान नहीं है, इसके लिए हमें अपने को परखना होगा। आपको क्या लगता है,आप अपने विचार अवश्य लिखकर भेजे।
द्वारा,सुझाव द्वारा प्रेम पूर्वक अपना समझकर समझाए।ऐसे मित्र मिलना इतना आसान नहीं है, इसके लिए हमें अपने को परखना होगा। आपको क्या लगता है,आप अपने विचार अवश्य लिखकर भेजे।
Saturday, September 26, 2009
Friday, September 25, 2009
Thursday, September 24, 2009
Tuesday, September 22, 2009
Friday, September 18, 2009
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