भारतीय स्त्री के साज-शृंगार को उसके सुहाग का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि ब्याह होते ही महिलाओं की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। गहने न केवल नारी के रूप को बढ़ाते हैं, बल्कि ये हमारी संस्कृति के भी परिचायक हैं
भारतीय नारी का गहनों और सोलह शृंगार से काफी पुराना रिश्ता रहा है। हर युवती के मन में विवाह को लेकर कई अरमान होते हैं। शादी का दिन किसी युवती की जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। नई जिंदगी की शुरुआत करने जा रही दुलहन को पहनाए जाने वाले गहने और सोलह शृृंगार का हमारी संस्कृति से भी गहरा नाता है। सोलह शृृंगार का एक-एक गहना गहरे अर्थ समेटे हुए है। महिलाओं का शृृंगार कवियों की रचनाओं का भी हिस्सा रहा है। आइए, बात करते हैं विवाहिताओं के साज-शृृंगार और उनसे जुड़ी मान्यताओं की।
ङ्क्षबंदी
बिंदु शब्द से बनी बिंदी को सुहागिन के परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। नारियां अपनी दोनों भवों के ठीक बीच ललाट पर लाल बिंदी जरूर लगाती हैं, जिससे उनका चेहरा खिल उठता है।
काजल
आंखों की सुंदरता पर लिखी गई कविताओं की तो गिनती भी संभव नहीं। इनको और सुंदर बना देता है काजल। ऐसा भी माना जाता है कि नवविवाहिता को काजल बुरी नजर से बचाता है।
सिंदूर
स्त्री-पुरुष जब जीवन के सफर में एक होकर चलने का प्रण करते हैं, तो स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करते हुए पुरुष पहली बार उसकी मांग में सिंदूर भरता है। यह उसके सुहागिन होने का सबसे बड़ा प्रतीक चिह्नï है।
शादी का जोड़ा
लाल रंग का लहंगा, चोली और ओढऩी में सजी दुलहन मानो आसमान से उतरी परी लगती है। वक्त के साथ-साथ अब शादी के जोड़े की कीमत हजारों से शुरू होकर लाखों रुपये तक पहुंच गई है।
हार
हार बिना शृृंगार कैसा? दुलहन के गले में पड़ा हार उसके सौंदर्य को चरम सीमा तक पहुंचा देता है। वर वधू को मंगलसूत्र के रूप में हार पहनाता है।
चूडिय़ां
चूडिय़ां तो सुहागिनों की विशेष रूप से पहचान कराती हैं। यहां तक कि कई बार चूडिय़ां बदलते समय सुहागिनें साड़ी के पल्लू से अपनी कलाई ढक लेती हैं, क्योंकि विवाहिता की कलाई कभी चूड़ी या कंगन के बगैर नहीं रहनी चाहिए, ऐसी हमारे यहां मान्यता है।
अंगूठी
शादी से पहले सगाई की रस्म तभी पूर्ण मानी जाती है, जब वर-वधू एक-दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं। अंगूठी की महत्ता कितनी है, इसका अंदाजा इससे लग जाता है कि जब भगवान राम ने हनुमान जी को अशोक वाटिका भेजा, तो संदेश के अतिरिक्त अपनी अंगूठी भी साथ भेजी थी।
कमरबंद
कमरबंद में लटक रहे चाबियों के गुच्छे से यह प्रतीत होता है कि इसे पहनने वाली घर की मालकिन है। इससे नारी का आकर्षण और भी बढ़ जाता है।
बिच्छुआ
पैरों में पहने जाने वाले आभूषणों को बिच्छुआ, अंगूठा या फिर आरसी भी कहते हैं। इस आभूषण में मछली, मोर, फूल, तितली इत्यादि की सुंदर आकृतियां बनी रहती हैं।
बाजूबंद
कड़े की तरह का यह नारी आभूषण बांहों में पूरी तरह से कसा रहता है, इसीलिए इसे बाजूबंद कहते हैं। मान्यता है कि नारी का यह आभूषण घर में धन की सुरक्षा करता है।
इयर ङ्क्षरग्स
कान में पहने जाने वाले इस आभूषण को कर्णफूल भी कहते हैं। विवाह के उपरांत नारी के लिए इयर रिंग्स पहनना जरूरी समझा जाता है।
नथ
नारी आभूषणों का एक अभिन्न हिस्सा है नथ। इस आभूषण के बारे में यह भी कहा जाता है कि विवाहिता का नथ जितना अधिक बड़ा और भारी होगा, उसका परिवार भी उतना ही समृद्ध होगा। नथ अधिकतर बाईं ओर पहनी जाती है। सोने की नथ बनाने का काम सबसे अधिक अमृतसर में होता है।
मेहंदी
शादी के समय दुलहन तथा परिवार की सभी सुहागिनें मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी हाथों और पैरों में लगाई जाती है। इसके बहुत ही मनमोहक डिजाइन बनाए जाते हैं। माना जाता है कि जिस सुहागिन की मेहंदी का रंग जितना अधिक गाढ़ा होता है, उसका पति उसे उतना ही अधिक प्यार करता है।
गजरा
सुगंधित फूलों से जड़ा गजरा दुलहन या सुहागिनों के बालों के जूड़े का शृृंगार बनता है। यह प्रथा दक्षिण भारत में तो बहुत अधिक प्रचलित है।
मांग टीका
दुलहन के सिर में बालों के ठीक बीच में मांग निकाली जाती है और उस हिस्से का स्वर्ण आभूषण कहलाता है मांग टीका। मांग सीधी और मध्य में होने से अभिप्राय है कि नवविवाहिता सीधा रास्ता अपनाए और बिना पक्षपात के निर्णय ले।
पायल
स्त्री के शृृंगार का यह ऐसा आभूषण है, जो अकसर चांदी से ही बनाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सोने को देवी-देवता धारण करते हैं। इसलिए इसे पांव में डालना शुभ नहीं होता। पांव में डाली जाने वाली पायल चांदी की ही बनाई जाती है। इसमें लगे छोटे-छोटे घुंघरुओं की आवाज से नववधू के आने की आहट मिल जाती है। यह आभूषण नवविवाहिता के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है।
Saturday, January 23, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment