Saturday, April 24, 2010

पत्र

आज समाचार पत्र है |  Today is a news paper.


कल कूड्रा पत्र  था। Yesterday is a  waste paper.

कल प्रश्नपत्र है। T0mmarow is a qestion paper.

जीवन उत्तरपत्र है।   Life is a answer paper.

Friday, March 12, 2010

 श्मशान माना चेंजिन्गरूम।अर्थी माना बिना रथ के-रथ है ये शरीरऔरसवार हैआत्मा यानि प्राण।अर्थात बिना प्राणोंके शरीर है अर्थी।

उम्मेद रखना माना बिमारी खरीद करना।

Thursday, January 28, 2010

लोरी

लल्ला लल्ला लोरी दूध की कटोरी
दूध में बताशा मुन्नी करे तमाशा

छोटी-छोटी प्यारी सुन्दर परियों जैसी है
किसी की नज़र ना लगे मेरी मुन्नी ऐसी है
शहद से भी मीठी दूध से भी गोरी
चुपके-चुपके चोरी-चोरी चोरी
लल्ला लल्ला लोरी ...

कारी रैना के माथे पे चमके चाँद सी बिंदिया
मुन्नी के छोटे-छोटे नैनों में खेले निंदिया
सपनों का पलना आशाओं की डोरी
चुपके-चुपके चोरी-चोरी चोरी
लल्ला लल्ला लोरी ...


लल्ला लल्ला लोरी दूध की कटोरी
दूध में बताशा जीवन खेल तमाशा

 

 

Saturday, January 23, 2010

दूल्हा

कम नहीं है दूल्हों के अंदाज 


शादी का दिन सभी के लिए बेहद अहम होता है। हालांकि, इस दिन के लिए लड़के पहले कंफ्यूजन में रहते थे कि वे क्या पहनें, लेकिन बाजार ने उनकी इस उलझन को दूर कर दिया है और दूल्हों के लिए अब वेस्टर्न और ट्रडिशनल अंदाज में खूब ड्रेसेज उपलब्ध हैं। 

शेरवानी का क्रेज 

वेडिंग में वियर में सबसे ज्यादा क्रेज फिलहाल शेरवानी का है। ये लगभग हर फैब्रिक और लेटेस्ट डिजाइंस में आपको मिल जाएंगी। सिल्क, जकार्ड, जापानी और इटैलियन फैब्रिक शेरवानियां बेहद पसंद की जा रही हैं। वैसे, शेरवानी की कीमत उस पर हुए वर्क पर डिपेंड करती है। यानी जितना हैवी वर्क होगा, उसकी कीमत उतनी ही ज्यादा होगी। शेरवानी पर कुंदन, जरकोजी, स्टोन, मोती व एम्ब्रॉयडरी वर्क खूब चलता है। 

शेरवानी पर मशीन से भी एम्ब्रॉयडरी की जाती है, लेकिन डिमांड हैंड वर्क की ज्यादा है। शेरवानी ऑफ वाइट, मरून, ब्लू, गोल्डन, क्रीम, पर्पल जैसे तमाम कलर्स में पसंद की जाती है। दिलचस्प बात यह है कि इसकी डिमांड विदेश में भी बहुत है। अगर आप डायमंड, गोल्डन या सिल्वर कलर की तार डलवाना चाहते हैं, तो उसका बंदोबस्त भी किया गया है। इनकी कीमत छह हजार रुपये से शुरू होकर एक लाख रुपये तक जाती है। 

अंगरखे में शाही दूल्हा 

कभी शाही परिवार की पहचान रहा अंगरखा अब दूल्हों की शान बढ़ा रहा है। ये तमाम फैब्रिक्स में बाजार में उपलब्ध हैं। इनकी कीमत इन पर किए गए स्टोन वर्क और एम्ब्रॉयडरी से तय होती है। अंगरखा को धोती और पेंट के साथ भी डाला जा सकता है और ये क्रीम व ऑफ वाइट कलर में ज्यादा पसंद किए जाते हैं। इनकी कीमत चार हजार रुपये से लेकर पचास हजार रुपये तक है। 

पुराना नहीं हुआ जोधपुरी का फैशन 

जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि यह सूट राजस्थान में खूब चलता है, लेकिन अपने गेटअप के चलते अब ये सूट काफी चलन में है। हालांकि, ये तमाम फैब्रिक्स में आते हैं, लेकिन इनकी डिमांड इटैलियन फैब्रिक में सबसे ज्यादा है। इनकी कीमत इन पर हुए वर्क और फैब्रिक की क्वॉलिटी से होती है। इसकी कीमत करीब तीन हजार रुपये से शुरू होकर करीब 70 हजार रुपये तक है। 

मौजूद है ट्रडिशनल ट्रेंड 

भले ही क्लोथ मार्किट में तमाम लेटेस्ट डिजाइन आते रहते हों, लेकिन कुर्ता और पजामा आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। फिलहाल, चाइनीज कॉलर और वी कॉलर के कुर्ते पजामे ट्रेंड में हैं। साथ ही, कुर्ते के गले पर हुआ स्टोन वर्क भी काफी पसंद किया जा रहा है। ये तमाम डार्क और ब्राइट कलर्स में मौजूद हैं और इनकी कीमत तीन हजार रुपये से लेकर दस हजार रुपये के बीच है। 

स्टॉल 

गले में डाले जाने वाले स्टॉल में आज भी जामनगर की धूम है। ये कॉटन व सिल्क जैसे फैब्रिक्स में आते हैं और वर्क और फैब्रिक के अनुसार इनकी कीमत पांच सौ रुपये से लेकर तीन हजार रुपयों के बीच रहती है।

दुल्हिन के सोलह श्र्गार

भारतीय स्त्री के साज-शृंगार को उसके सुहाग का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि ब्याह होते ही महिलाओं की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। गहने न केवल नारी के रूप को बढ़ाते हैं, बल्कि ये हमारी संस्कृति के भी परिचायक हैं

भारतीय नारी का गहनों और सोलह शृंगार से काफी पुराना रिश्ता रहा है। हर युवती के मन में विवाह को लेकर कई अरमान होते हैं। शादी का दिन किसी युवती की जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। नई जिंदगी की शुरुआत करने जा रही दुलहन को पहनाए जाने वाले गहने और सोलह शृृंगार का हमारी संस्कृति से भी गहरा नाता है। सोलह शृृंगार का एक-एक गहना गहरे अर्थ समेटे हुए है। महिलाओं का शृृंगार कवियों की रचनाओं का भी हिस्सा रहा है। आइए, बात करते हैं विवाहिताओं के साज-शृृंगार और उनसे जुड़ी मान्यताओं की।

ङ्क्षबंदी
बिंदु शब्द से बनी बिंदी को सुहागिन के परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। नारियां अपनी दोनों भवों के ठीक बीच ललाट पर लाल बिंदी जरूर लगाती हैं, जिससे उनका चेहरा खिल उठता है।

काजल
आंखों की सुंदरता पर लिखी गई कविताओं की तो गिनती भी संभव नहीं। इनको और सुंदर बना देता है काजल। ऐसा भी माना जाता है कि नवविवाहिता को काजल बुरी नजर से बचाता है।

सिंदूर
स्त्री-पुरुष जब जीवन के सफर में एक होकर चलने का प्रण करते हैं, तो स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करते हुए पुरुष पहली बार उसकी मांग में सिंदूर भरता है। यह उसके सुहागिन होने का सबसे बड़ा प्रतीक चिह्नï है।

शादी का जोड़ा
लाल रंग का लहंगा, चोली और ओढऩी में सजी दुलहन मानो आसमान से उतरी परी लगती है। वक्त के साथ-साथ अब शादी के जोड़े की कीमत हजारों से शुरू होकर लाखों रुपये तक पहुंच गई है। 

हार
हार बिना शृृंगार कैसा? दुलहन के गले में पड़ा हार उसके सौंदर्य को चरम सीमा तक पहुंचा देता है। वर वधू को मंगलसूत्र के रूप में हार पहनाता है।

चूडिय़ां
चूडिय़ां तो सुहागिनों की विशेष रूप से पहचान कराती हैं। यहां तक कि कई बार चूडिय़ां बदलते समय सुहागिनें साड़ी के पल्लू से अपनी कलाई ढक लेती हैं, क्योंकि विवाहिता की कलाई कभी चूड़ी या कंगन के बगैर नहीं रहनी चाहिए, ऐसी हमारे यहां मान्यता है।

अंगूठी
शादी से पहले सगाई की रस्म तभी पूर्ण मानी जाती है, जब वर-वधू एक-दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं। अंगूठी की महत्ता कितनी है, इसका अंदाजा इससे लग जाता है कि जब भगवान राम ने हनुमान जी को अशोक वाटिका भेजा, तो संदेश के अतिरिक्त अपनी अंगूठी भी साथ भेजी थी। 

कमरबंद
कमरबंद में लटक रहे चाबियों के गुच्छे से यह प्रतीत होता है कि इसे पहनने वाली घर की मालकिन है। इससे नारी का आकर्षण और भी बढ़ जाता है।

बिच्छुआ
पैरों में पहने जाने वाले आभूषणों को बिच्छुआ, अंगूठा या फिर आरसी भी कहते हैं। इस आभूषण में मछली, मोर, फूल, तितली इत्यादि की सुंदर आकृतियां बनी रहती हैं।  

बाजूबंद
कड़े की तरह का यह नारी आभूषण बांहों में पूरी तरह से कसा रहता है, इसीलिए इसे बाजूबंद कहते हैं। मान्यता है कि नारी का यह आभूषण घर में धन की सुरक्षा करता है।

इयर ङ्क्षरग्स
कान में पहने जाने वाले इस आभूषण को कर्णफूल भी कहते हैं। विवाह के उपरांत नारी के लिए इयर रिंग्स पहनना जरूरी समझा जाता है।

नथ
नारी आभूषणों का एक अभिन्न हिस्सा है नथ। इस आभूषण के बारे में यह भी कहा जाता है कि विवाहिता का नथ जितना अधिक बड़ा और भारी होगा, उसका परिवार भी उतना ही समृद्ध होगा। नथ अधिकतर बाईं ओर पहनी जाती है। सोने की नथ बनाने का काम सबसे अधिक अमृतसर में होता है।

मेहंदी
शादी के समय दुलहन तथा परिवार की सभी सुहागिनें मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी हाथों और पैरों में लगाई जाती है। इसके बहुत ही मनमोहक डिजाइन बनाए जाते हैं। माना जाता है कि जिस सुहागिन की मेहंदी का रंग जितना अधिक गाढ़ा होता है, उसका पति उसे उतना ही अधिक प्यार करता है।

गजरा
सुगंधित फूलों से जड़ा गजरा दुलहन या सुहागिनों के बालों के जूड़े का शृृंगार बनता है। यह प्रथा दक्षिण भारत में तो बहुत अधिक प्रचलित है।  

मांग टीका
दुलहन के सिर में बालों के ठीक बीच में मांग निकाली जाती है और उस हिस्से का स्वर्ण आभूषण कहलाता है मांग टीका। मांग सीधी और मध्य में होने से अभिप्राय है कि नवविवाहिता सीधा रास्ता अपनाए और बिना पक्षपात के निर्णय ले।

पायल
स्त्री के शृृंगार का यह ऐसा आभूषण है, जो अकसर चांदी से ही बनाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सोने को देवी-देवता धारण करते हैं। इसलिए इसे पांव में डालना शुभ नहीं होता। पांव में डाली जाने वाली पायल चांदी की ही बनाई जाती है। इसमें लगे छोटे-छोटे घुंघरुओं की आवाज से नववधू के आने की आहट मिल जाती है। यह आभूषण नवविवाहिता के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है।

Friday, January 22, 2010

मकर संक्रांति

मकर संक्रान्ति----अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने का प्रतीक पर्व
 
कल 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर्व का आगमन हो रहा है,जिसे कि तिल संक्रांति भी कहा जाता है। यही एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारतवर्ष में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों। इसके माध्यम से हमें भारतवर्ष के सांस्कृतिक वैविधय की रंग-बिरंगी छटा देखने को मिलती है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है । इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, किंतु मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर बढने लगता है। जिससे कि दिन की बजाय रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा यहीं से ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ हो जाता है। अब दिन बड़ा होगा तो निश्चित रूप से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार घटने लगेगा। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य के इस राशि परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होगी------यही जानकर इस देश के विभिन्न प्रान्तों में विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
हमारे ऋषि-मुनियों नें इस पर्व के साथ एक प्रावधान जोड रखा है कि आज के दिन तिल, गुड़ के बने पदार्थों का सेवन करें और यथासामर्थ्य इन्ही वस्तुओं,पदार्थों का दान भी करें। दरअसल वातजन्य विकारों से बचने के लिए तिल सेवन के प्रयोजन के लिए ही तिल सक्रांति पर्व का निर्धारण किया गया है। यदि इस समय गुड,तिल का सेवन न किया जाए तो वसंत ऋतु में कफ तथा वर्षा ऋतु में वात रोग से पीडित होने की संभावनाएं बढ जाती हैं। इन्ही पदार्थों का दान करना भी इसलिए कहा गया है ताकि समाज का जो गरीब भिखारी वर्ग हैं, जो इन पदार्थों पर धन व्यय नहीं कर सकता, वो लोग भी इनका सेवन कर सकें।
अब दान की बात चली है तो एक बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा। जैसा कि इस सनातन संस्कृ्ति को जानने वाला प्रत्येक व्यक्ति भली भांती परिचित है कि समस्त धार्मिक ग्रन्थों, शास्त्रों, पुराणों में दान की कैसी महिमा कही गई है। चाहे आप कोई भी धर्म ग्रन्थ उठा लीजिए या आप किसी धार्मिक कथा को पढ लीजिए आपको ये बात जरूर पढने को मिलेगी कि किसी पर्व विशेष पर ब्राह्मण को अमुक वस्तु का दान करने से इतना पुण्य मिलता है इत्यादि इत्यादि....यानि कि जन्म से लेकर मृ्त्यु प्रयन्त प्रत्येक अवसर पर किसी न किसी रूप में ब्राह्मण को दान देने पर जोर दिया जाता है।
प्रत्येक धर्म ग्रन्थ में सिर्फ ब्राह्मण को ही दान लेने का अधिकारी इसलिए कहा गया है क्यों कि प्राचीनकाल में ब्राह्मण वर्ग एक तपा हुआ, परखा हुआ, चरित्रवान और लोकसेवी जन समुदाय था, जिसका सारा समय शास्त्र अध्ययन, समाज को शिक्षित करने, धार्मिक कृ्त्यों एवं अन्य लोक हितार्थ कार्यों में ही व्यतीत हो जाता था। उनके व्यक्तिगत व्यय की सीमाऎं बिल्कुल न्यून हुआ करती थी ओर उनके सारे प्रयत्न समाज हित की योजनाएं संजोने में हुआ करते थे। इसलिए उसके जीवन निर्वाह का भार समाज के अन्य वर्गों पर डाल कर दान देने की एक व्यवस्था बनाई गई थी । उस जमाने में दान के लिए पात्र-कुपात्र की, उपयोगिता-अनुपयोगिता की चिन्ता किसी को नहीं करनी पडती थी। जो कुछ भी देना होता था, वो ब्राह्मण के हाथों में सौंप दिया जाता था और देने वाला भी उसे अपना कर्तव्य मान कर दिया करता था। तब ब्राह्मण को देने का अर्थ समाज के लिए----धर्म के लिए----सत्प्रवृ्तियों के अभिवर्धन के लिए देना ही माना जाता था। आज वैसी स्थिति नहीं रही........आज समाज का ढाँचा पूरी तरह से बदल चुका है-----आज ब्राह्मण वर्ग पर समाज को शिक्षित करने, ज्ञान विस्तार ओर मार्गदर्शन की कैसी भी जिम्मेवारी का कोई बोझ नहीं है कि उसकी उदरपूर्ती, उसके जीवन निर्वहण के बारे में समाज के अन्य वर्गों को सोचना पडे। इसलिए ब्राह्मण को दान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न मानकर दान के लिए किसी निर्धन, लाचार, दीन-हीन प्राणी का चुनाव करें तो ही आपके द्वारा किया गया दान सही मायनों में पुण्यदायी हो सकता है।
आप सब को मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाऎँ..

Wednesday, January 20, 2010

गाँवों के खेल

गाँवों के खेल -जलेबी रेस , कंचा रेस , सतोलिया , लट्टू , गिल्ली डंडा ,लंगड़ी टांग
Contents
जलेबी रेस :
चम्मच रेस :
सतोलिया :
लंगड़ी टांग :
लट्टू :
कंचे :
रस्सी कूदना :
गिल्ली डंडा :
बोरा रेस :
तीन टांग की रेस :
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भारत की आत्मा गांवों में बसती है | गाँव की औरतें दिन भर चूल्हा चौका , बर्तन झाडू में लगी रहती हैं | यहाँ तक कि गाय , भैंसों का काम एवं खेती बाड़ी में भी दिन भर खटती रहती हैं | इन महिलाओं के लिए या इनके बच्चों के लिए टेबल टेनिस , बेडमिन्टन एवं गोल्फ जैसे खेलों को एक सपना ही कहा जाएगा | जहाँ दो वक़्त की रोटी मुश्किल से नसीब होती हो , जिसके लिए इतनी मेहनत करनी पढ़ती हो , वहां यदि कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खेल कूद की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएँ तो गाँव की महिलाओं एवं बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है | सीमित साधनों में मनोरंजन हो जाता है और इनके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बनती है |

गाँव में फुर्सत में बच्चे यह खेल अक्सर खेला करते हैं | लड़कों का मनपसंद खेल है गिल्ली डंडा और कंचे , लड़कियों का लंगड़ी टांग और सतोलिया | जिन लोगों को इन खेलों के बारे में पता नहीं है या वह शहरी लोग जिनकी सुबह होती है ई मेल देखने से और सारी रात बीतती है सोशल नेट वर्किंग , फेस बुक , ट्विटर , ऑरकुट इत्यादि पर उनके लिए तो यह एक अजूबा ही हैं |
आइये देखें क्या होते हैं यह खेल :

जलेबी रेस :

१५ अगस्त या २६ जनवरी को यह खेल आयोजित किया जा सकता है | इसमें एक रस्सी टांगी जाती है जिस पर जलेबियाँ लटकाई जाती हैं | महिलाएं एवं बच्चे सब इसे खेल सकते हैं | एक , दो , तीन की गिनती के साथ रेस शुरू होती है | भागते भागते ऊपर उचक कर जलेबी को खाना पड़ता है और फिर से सरपट दौड़ना पड़ता है | स्वाद का स्वाद और खेल का खेल | कार्बोहाईड्रेट खाओ और फिर उसे पचाओ | इससे अच्छा भला और कौन सा खेल होगा ? सबकी निगाहें ईनाम के पैकेट की तरफ लगी रहती हैं , उत्साह दुगुना हो जाता है |

चम्मच रेस : 
इसमें एक चम्मच मुंह में पकड़ना पड़ता है जिसमें एक कंचा रखा रहता है | एक , दो, तीन और यह शुरू हो गयी रेस | अरे ये क्या , कंचा ही गिर गया | इतना आसान भी नहीं है साड़ी पहनकर दौड़ना | समाज के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा ईनाम वितरित किये जाते हैं | हाल ही में मैंने अखबार में पढ़ा था कि किसी गाँव में इसका आयोजन किसी गैर सरकारी संस्थान द्वारा किया गया था | पढ़कर अत्यंत ही ख़ुशी हुई | साड़ी पहने हुए औरतों की फोटो भी अखबार में थी | गाँव में मल्टीप्लेक्स या मॉल तो होते नहीं हैं इसलिए भोले भाले लोग छोटी छोटी खुशियों से ही खुश हो लेते हैं |  

सतोलिया :

सात पत्थरों का खेल | इसमें कोई पैसा खर्च नहीं होता और स्वास्थ्य भी बना रहता है | ढूँढने पड़ते हैं सिर्फ सात चपटे पत्थर जिन्हें एक के ऊपर एक जमाया जाता है | नीचे सबसे बड़ा पत्थर और फिर ऊपर की तरफ छोटे होते पत्थर | 
दो टीमें होती हैं और एक गेंद | इसे घर के बाहर या पार्क में भी खेला जा सकता है | गाँव में तो जगह की कोई कमी नहीं है , आप चाहें तो अपने फ्लैट के आगे शहर में भी खेल सकते हैं | एक टीम का खिलाडी गेंद से पत्थरों को गिराता है और फिर उसकी टीम के सदस्यों को उसे फिर से जमाना पड़ता है और बोलना पड़ता है '' सतोलिया '' | इस बीच दूसरी टीम के ख़िलाड़ी बाल को पीछे से मारते हैं , यदि वह बाल सतोलिया बोलने से पहले लग गयी तो टीम आउट | कितने भी लोग इसे खेल सकते हैं पर दोनों टीमों में होने बराबर के चाहियें | यदि एक एक्स्ट्रा ख़िलाड़ी है तो उसे किसी को पटाना पड़ता है खेलने के लिए , चाहे उसका मन हो या न हो |
है न अच्छा खेल | न जगह का गम और न पैसे का ,सिर्फ एक गेंद की ही तो बात है |
देर किस बात की है , हो जाइए शुरू |

लंगड़ी टांग : 
यह अक्सर लड़कियों द्वारा छत पर या आँगन में खेला जाता है | कई खाने बनाये जाते हैं और दो लडकियां इसे एक चपटे पत्थर के टुकड़े से खेलती हैं | पत्थर को एक टांग पर खड़े रहकर सरकाना पड़ता है , बिना लाइन को छुए हुए | अंत में एक टांग पर खड़े रहकर इसे एक हाथ से बिना लाइन को छुए उठाना पड़ता है | भरी दोपहरी में जब नींद न आ रही हो और पढने का भी मन नहीं हो तो क्या करें ? जी हाँ तब खेलिए लंगड़ी टांग और देखिये कि आपने इसे न खेलकर ज़िन्दगी के बेहतरीन पल कैसे गँवा दिए |

लट्टू :
इसे अक्सर लड़के लोग हाथों पर रस्सी द्वारा नचाते हैं और फिर फर्श पर फेंकते हैं | जब दिमाग में तनाव हो या पढने में मन नहीं लग रहा हो तब कुछ देर लट्टू चलायें , तब देखिये कि कितना फोकस होकर पढ़ पाते हैं और साथ ही साथ होता है हाथों और पैरों का व्यायाम | 

कंचे :
यह अक्सर लड़कों द्वारा खेला जाता है | एक गड्ढा बनाया जाता है और उसमें कुछ दूरी से जहां एक रेखा खिंची होती है कंचे फेंके जाते हैं | जिसके कंचे सबसे ज्यादा गिनती में गड्ढे में जाते हैं वह जीतता है | कुछ यूँ समझ लीजिये कि यह शहर में खेले जाने वाले बिलीअर्ड कि तरह ही है |

रस्सी कूदना : 
वैसे तो सभी को पता है कि रस्सी वजन घटाने के लिए एक अच्छा व्यायाम है पर गाँव में इसे दूसरे तरीके से खेल की तरह खेला जाता है | वहां वजन का टेंशन जो नहीं होता इसलिए मज़े लेकर खेला जाता है | दो लडकियां एक रस्सी को दोनों सिरों से पकड़ लेती हैं और उसे घुमाना शुरू करती हैं | तीसरी लड़की बीच में कूदती है | सबकी बारी आती है , जो सबसे ज्यादा बिना रुके कूदती है वह जीतती है |

गिल्ली डंडा :

गिल्ली एक स्पिंडल के आकार की होती है और साथ में होता है एक छोटा सा डंडा | गिल्ली के एक सिरे को डंडे से मारा और ये गयी गिल्ली हवा में | आरे भाई जरा अपनी आँख बचाना यह बहुत खतरनाक होती है |


बोरा रेस :
एक बोरे में टांगें बाँध दी जाती हैं और कूद कूद कर भागना पड़ता है | सब गिरते पड़ते हुए भागते हैं , देखकर बड़ी हंसी आती है |

तीन टांग की रेस :
दो जनों की एक एक टांग साथ में बाँध दी जाती है और फिर रेस लगायी जाती है | आपसी तालमेल होना बहुत जरुरी होता है |

मटका रेस :
गाँव कि औरतें और मटका रेस न हो बड़ा अजीब सा लगता है न ? 


और भी न जाने कितने खेल हमारे देश की उपज हैं जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं | अरे हाँ कबड्डी तो मैं भूल ही गयी और क्रिकेट भी तो तीन डंडे गाढ़कर खेला जाता है | तैराकी को ही लीजिये , जरा सी बरसात हुई नहीं कि बच्चे लग गए पोखर और तालाबों में तैरने ,इनके लिए तो यही स्विमिंग पूल है , किसे चिंता है बीमार होने की | अपनी मिट्टी में पलकर बढे हुए हैं तो उससे भला डर कैसा ?

मेरा आप सबसे निवेदन है कि इन खेलों को बढ़ावा दें , गाँव में ही क्यूँ शहरों में भी इन्हें खेलें | अपने खेलों को खेलने में भला कैसी शर्म | अपने देश के गाँव में जाने से कैसी शर्म | खेतों की पगडंडियाँ , मिट्टी की सौंधी खुशबू , कुएं का पानी , चूल्हे की रोटी , साग , गुड , छाछ सब बुला रहे हैं आपको | चलिए चलें इन सबका आनंद लें और साथ ही साथ करें मनोरंजन और देखें ख़ुशी बच्चों के चेहरों पर

Tuesday, January 5, 2010

सुखी रहने का मंत्र

कहते हैं'निरइच्छा वाले को भगवान भी नहीं जीत सकता।'मनुष्य और निरइच्छा'क्या सम्भव है?ईश्वर इच्छा पर चलने से मनुष्य सुखी हो सकता है।अपने को भगवान के भरोसे छोड्र दो,समय जो तुमसे करा ले जाए,तुम सिर्फ एक साधन हो मात्र ।बहुत सुखी रहोगे।जिसने जन्म दिया है वही पालेगा भी,चलाएगा भी  तुम सिर्फ दर्शक बने रहो कि वह तुम से क्या करवा रहा है।बडा मजा आएगा।यह इतना आसान नहीं है,इसके लिए अपने पर संयम रखना होगा। 

instrumental music

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