कितनी अजीब है ये मैं?कितने अर्थ हैं इस मैं के?एक मैं कहती है मैं ही तो हूं,मेरे सिवा और है कौन दूसरा?दूसरी मैं कहती है मैं कुछ नहीं हूं,जो कुछ है वो परमात्मा ही है।तीसरी मैं कहती है-न मैं हूं, न वो है ,तू ही है, तेरे सिवा और है कौन?
एक मैं जो अहंकार की है,एक मैं विशालता की है,एक मैं गीता में कृष्ण की है,एक मैं अर्जुन की भी है।लगता है सारा खेल मैं,तूऔरवह के बीच का ही है।मैं,तू,वह-ये तीन पुरुषवाची सर्वनाम कहे जाते हैं।ये तीनों जब अपने बारे में कुछ बताना चाहते हैं तो अपने लिये “मैं”का ही इस्तेमाल करते हैं।वास्तव में ये तीनों अलग अलग नहीं हैं,वरन एक पुरुष के ही तीन रूप हैं।एक ही पुरुष कभी मैं,कभी तू तो कभी वह हो जाता है। हमारी लौकिक तुच्छ सोच ने इसे तीन में बाँट दिया है लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से यह ठीक भी है।
आध्यात्मिक दृष्टि से तीनों एक ही हैं।जब हमारी सोच इस तरह की होती है तो मैं,तू,वह-मैं ही होते है।यह मैं”अहम ब्रह्म अस्मि”,ओहम-सोहम, तत्त्वम असि ,जो तू है-सो मैं हूँ के एकीकृत रूप में समाहित हो जाती है।इंसान की यह स्थिति उसे परम आनन्द की ओर ले जाती है,क्योंकि वह मैं को यानि स्वयं को कभी भी दुखी नहीं कर सकता।लौकिक रूप में तो वह निरंतर अपने स्वार्थ की तुष्टि में तत्पर रहता है,सतोधर्मी होने पर परार्थ के लिये तत्पर होता तो हैकिंतु उसके मन में कर्तापना रहता है कि मैंने कुछ किया,अपने को दूसरों से बेहतर समझने लगता है जो उसके अहम को दर्शाता है,इसीकारण वह परम आनन्द को प्राप्त नहीं हो पाता।अत:हम सबको अपनी मैं दिखानी ही है तो क्यों न विशालता की मैं दिखाएँ और वसुधैव कुटुम्बुकम की भावना से ,प्यार और शांती से रहें।
Thursday, June 25, 2009
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